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Mar 11, 2013

Dushyant Kumar Poem


ज़िन्दगी में कुछ भी कभी हरपल नहीं रहता
जो आज साथ होता है तुम्हारे वो कल नहीं रहता

मैं फ़िज़ूल रोया करता था लम्हों पे दशको पे
समझ आया अब की वक़्त खुद भी सदा प्रबल नहीं रहता

मरते हैं इसके भी पल जो बहते हैं इसकी धाराओ में
सदा को ठहरा हुआ कोई भी इसका पल नहीं रहता

सिर्फ तू भंवर में है ये सोचना सरासर भूल है
ये झरना है, इस अहद में अब ये कल-कल नहीं बहता

इस दूध की धारा को मैंने पूजा भी दिए भी सिराये
पर जब से सागर में मिला फिर वो गंगाजल नहीं रहता

कितना लालची हूँ की जिसके सजदे किये नवाज़ा भी
वो जब से खारा हुआ ठोकरों के भी काबिल नहीं रहता

तू हाथों की लकीरों पे चला तो नदी जैसा भटकता रहा
तूने खुद को कभी नहीं खोजा तभी तू सफल नहीं रहता

और तू मुझे मसीहा मत समझ मैं खुद विफल हूँ हालातों से
हाँ मगर होंसला अब नहीं हरा वर्ना ये ग़ज़ल नहीं कहता

Mar 7, 2013

Einstein Quote

Politics it the art of possible, Science is the art of soluble - Albert Einstein

Mar 6, 2013

Dushyant Kumar's New Poem

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख 

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख 

अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह
यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख 

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ ,उन हाथों में तलवारें न देख 

दिल को बहला ले इजाज़त है मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख 

ये धुँधलका है नज़र का,तू महज़ मायूस है
रोज़नों को देख,दीवारों में दीवारें न देख 

राख, कितनी राख है चारों तरफ़ बिखरी हुई
राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख.